आप अपने मोबाईल फोन से क्या करवाना चाहते हैं? कुछ ऐसा ही सवाल पूछा था मैसाचूसिट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी के प्रोफेसर हाल एबेल्सन ने कंप्यूटर विज्ञान के छात्रों से। इन छात्रों को असाइनमेंट के तौर पर प्रोफेसर हाल ने मोबाईल फोन के लिए सॉफ्टवेयर तैयार करने को कहा। इसके साथ ही एक शर्त भी जोड़ दी गई कि प्रोग्राम, गूगल के जल्द आने वाले एंड्रॉयड मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम को ध्यान में रखकर बनाया जाना चाहिए। एंड्रॉयड जैसी प्रणाली, मोबाइल की दुनिया में क्रांति लाने वाली हैं। इसके बाद वायरलेस कंपनियों का उपकरणों पर आधिपत्य खत्म हो जाएगा। अगर असाइनमेंट के तौर पर जमा किए प्रोग्राम पर नजर डालें तो अंदाजा लगता है कि फोन, इंटरनेट और सॉफ्टवेयर की दुनिया में कैसी हलचलें पैदा करने वाला है।
इन छात्रों के लिए मोबाईल फोन का सबसे बड़ा काम है, अपनी भौगोलिक स्थिति का पता करना। सात टीमों में से ज्यादातर ने ऐसे प्रोग्राम ईजाद किए जो लोगों की भौगोलिक स्थिति का पता कर सकते हों। इतना ही नहीं इनमें उपयोगकर्तायों के दोस्तों की स्थिति पता कराने की भी क्षमता होनी चाहिए ताकि मेल मुलाकात में ज्यादा झंझट न हो। जिओ लाइफ नाम के एक प्रोजेक्ट में क्या करें और कब करें, प्रकार की सूची तय करने का चुनाव रहता है। मसलन आप कहीं जाने की सोच रहें तभी फोन बाजार जाने की याद दिलाए और बाजार से लौटने के ठीक पहले बताए कि अभी दूध खरीदना बाकी है।
इसी तरह से फ्लेर नाम के प्रोजेक्ट में पित्जा की दुकान चलाने वालों को फोन के जरिए ही अपने ड्राइवरों कीलोकेशन पता लगाने की सुविधा मिल गई। इसी तरह लोकेल नाम के प्रोग्राम में फोन कुछ निश्चित क्षेत्र में खुद से ही अपना व्यवहार तय कर लेगा। मसलन ऑफिस में जाते ही फोन वाइब्रेशन मोड पर आ जाएगा जबकि मूवी हॉल में साइलेंट मोड पर। इस असाइनमेंट के दौरान स्टूडेंट्स को तीन महीने के अंदर गूगल के एंड्रॉयड फोन के हिसाब से सॉफ्टवेयर विक्सित करना था लेकिन दिलचस्प बात ये है कि इनके पास इस नए ऑपरेटिंग सिस्टम का कोई भी मॉडल उपलब्ध नहीं था। दरअसल पूरी तरह से वायरलेस तकनीक पर आधारित ये फोन अभी विकसित ही हो रहे हैं और तकनीकी हलकों में इन पर चर्चा जारी है। मगर यही छात्रों के लिए असली चुनौती थी। इसके साथ ही उन्हें लागत और फीचर इफेक्ट का भी ध्यान रखते हुए अपने प्रोग्राम को एक बिजनेस आइडिया की तरह विकसित करना था। इसके लिए उन्होंने एंड्रॉयड से मिलते जुलते फीचरों वाला एक कंप्यूटर प्रोग्राम इस्तेमाल किया और उसी के आधार पर अपना सॉफ्टवेयर विकसित किया।
इस पूरी कवायद में प्रोफ़ेसर का मकसद पूरा हो गया। अपने छात्रों को कल की तस्वीर देखने और बनाने के लिए प्रेरित करने का। छात्र तो प्रोजेक्ट पर काम करने के दौरान ऐसी तकनीक के बारे में भी सोचने लगे जिसमें कुछ खास जगहों पर भी कुछ लोगों की कॉल आ सकती हैं हर जगह नहीं। अगर हमारे फोन इतने 'समझदार' हो जाएं तो कई मुसीबतों और अनचाही कॉलों से छुटकारा मिल सकता है। इसी वजह से प्रोजेक्ट प्रस्तुतीकरण के बाद प्रोफ़ेसर हाल ने कहा कि यह कक्षा, भविष्य की झलक देती है और सबसे अच्छी बात ये है कि ये भविष्य हमसे बहुत दूर नहीं है।
(विभिन्न वेब पोर्टलों से संकलित)
Friday, 16 May, 2008
खुद फैसले लेने वाले स्मार्ट मोबाइल फोन
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1 ग्रहवासी पधारे:
bahut badhiya khabar..
achchha laga padhkar.. :)
ab intjaar hai is s/w aur mobile ke aane ka..
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