गूगल की दुनिया में ढ़ूंढ़िये

 

Sunday 22 November 2009

सन् 2020 तक दिमाग में फिट होने लगेंगे कम्प्यूटर!!

अगर आपके सोचने मात्र से ही कमरे की लाइट जल उठे, टीवी पर मनचाहा चैनल आ जाए या फिर कम्प्यूटर स्क्रीन पर टाइप होने लगे तो। क्या सोचने लगे आप, जी हां यह संभव है। वैज्ञानिकों ने एक ऐसे चिप का डिजाइन तैयार किया है, जिसके दिमाग में लगाने के बाद यह सब संभव हो जाएगा।

यह चिप दिमाग के बाहरी सतह पर लगाया जाता है और इसके साथ ही एक रिसीवर सर पर भी लगाया जाता है। यह रिसीवर चिप द्वारा भेजी गई सूचनाओं को ग्रहण करता है। चिप दिमाग में मौजूद नर्व सेल्स की गतिविधियों को समझ कर सूचनाएं सर पर लगे रिसीवर को वायरलेस माध्यम से भेज देता है। रिसीवर इन सूचनाओं के अनुसार टीवी, कम्प्यूटर आदि को आदेश भेज देता है। जैसे अगर दिमाग में आता है कि टीवी को बंद कर देना चाहिए तो इस सूचना को चिप सर पर लगे रिसीवर को भेज देता है और इसी के साथ रिसीवर टीवी में लगे सेन्सर को टीवी बंद करने का आदेश भेज देता है।




(इस तकनीक के प्रयोग का एक दिलचस्प वीडियो)

चिप को डिजाइन करने वाले वैज्ञानिक का कहना है कि इससे शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों को मदद मिलेगी। उन्होंने आगे कहा कि इस क्षेत्र में अमेरिका में कई रिसर्च चल रहे हैं, परंतु इनमें वायर्ड सेंसर का इस्तेमाल किया गया है, जबकि मेरे डिजाइन में वायरलेस सेंसर का इस्तेमाल किया गया है, इसमें संक्रमण का खतरा नहीं होता। गौरतलब है कि इससे पहले जापान के वैज्ञानिकों ने भी दिमाग की गतिविधियों को समझ कर चलने वाला व्हीलचेयर बनाया था।

समाचार आपको यहाँ मिल जाएगा।

Sunday 18 October 2009

एक दिमाग से दूसरे दिमाग में संदेश, इंटरनेट के सहारे!!

ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने ‘दिमाग से दिमाग तक संचार’ वाली प्रणाली तैयार करने का दावा किया है। साउथेम्पटन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का कहना है कि उनकी प्रणाली किसी के विचार, शब्द और तस्वीरें दूसरे लोगों के दिमाग तक पहुंचाने में मदद करेगी, खासतौर से विकलांग लोगों के दिमाग तक। मुख्य वैज्ञानिक डॉ. क्रिस्टोफर जेम्स के मुताबिक उनकी इस प्रणाली को इंटरनेट का भविष्य कहा जा रहा है जो बिना की-बोर्ड और टेलीफोन के संचार का नया तरीका उपलब्ध कराएगा। यह उन लोगों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है जो न तो बोल सकते हैं और न ही पलकें हिला सकते हैं।


(प्रयोग का एक चित्र: साउथेम्पटन यूनिवर्सिटी से साभार)

वैज्ञानिकों ने इस प्रणाली के लिए ‘ब्रेन कम्पयूटर इंटरफेसिंग’ तकनीक का इस्तेमाल किया। इस तकनीक में कम्पयूटर दिमाग के सिग्नलों का विश्लेषण करता है और दिमाग में आए विचारों को इंटरनेट कनेक्शन के जरिए मीलों दूर बैठे व्यक्ति के दिमाग में पहुंचा देता है।

डॉ. जेम्स के मुताबिक ट्रांसमिशन (संचरण) के दौरान दो लोगों को इलैक्ट्रोड से जोड़ा गया। ये इलैक्ट्रोड दिमाग के खास भागों की कार्यप्रणाली मापते हैं। पहले व्यक्ति ने शून्य और एक की श्रृंखला भेजी जिससे यह अंदाजा लगाया गया कि शून्य के लिए उन्होंने अपना बायां हाथ उठाया और एक के लिए दायां हाथ। जैसे ही पहले व्यक्ति के कम्पयूटर ने बायनरी (द्विआधारी) विचारों को पहचाना, उसे इंटरनेट पर भेज दिया और बाद में दूसरे व्यक्ति के कम्पयूटर पर। इसके बाद शून्य और एक की विभिन्न आवृतियों पर एक एलईडी लैंप जलाया गया।

दूसरे व्यक्ति के दिमाग के सिग्नलों का विश्लेषण इस एलईडी लैंप पर गौर करने के बाद किया गया, जिसमें कम्पयूटर ने अंकों की श्रृंखला को पकड़ा। डॉ. जेम्स ने बताया कि यह टैलीपेथी (दूर संवेदन) नहीं है। उन्होंने बताया कि इस दौरान व्यक्ति के मन में विचार पहले से ही नहीं आए होते हैं और न ही दूसरे के मन में ये विचार होते हैं।



(इस परिकल्पना का सिद्धांत व वास्तविक प्रयोग दर्शाता एक वीडियो)

एक चुलबुले वैज्ञानिक का कहना है कि इस दिशा में अभी बहुत लम्बा रास्ता तय करना है। वैसे अगले 30 वर्षों में ऐसा होगा कि आपने पत्नी के लिए कुछ सोचा और वह अगले ही क्षण उसके मोबाईल पर प्रदर्शित हो जाएगा। लेकिन यह सुनिश्चित करना पड़ेगा कि संदेश आपकी पत्नी के मोबाईल पर ही जाए, दूसरे की पत्नी के मोबाईल पर नहीं या फिर, वैसा ही कुछ, कोई और सोच बैठे तो!?

संबंधित खबर यहाँ देखी जा सकती है। कुछ अधिक जिज्ञासा हो तो इस परियोजना की वेबसाईट देख लें।

Wednesday 7 October 2009

बाईक चलाईए, मोड़कर बैग में रखिए, ऑफिस या घर ले जाइए, यात्रा पर ले जाईए!

गाड़ियों की बढ़ती संख्या के कारण पार्किंग की समस्या से दो-चार होना हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। इसके साथ ही गाड़ियों के चोरी होने का डर अलग से सताता है। इन सभी परेशानियों को देखते हुए कई बार हम यह सोचते हैं की काश कुछ ऐसा होता, जिससे इन समस्याओं का हल मिल जाता।
रुकिए, अब चिंता करने की जरूरत नहीं है। वैज्ञानिकों ने ऐसी बाइक बना ली है, जिसे सफर के बाद मोड़कर बैग में डाल अपने साथ ले जाया जा सकता है। याइक बाइक नामक इस बाइक को न्यूजिलैंड के वैज्ञानिक ग्रैंट रयान और पिटर हिजिंस ने बनाया है।





(इस चलती फिरती नन्ही मुन्नी बाईक के अंदाज़ का एक शानदार वीडियो)

याइक बाइक बिजली से चलने वाली बाइक है, इसके लिए इसमें 1.2 किलोवाट का बिजली से चलने वाला मोटर लगाया गया है। वजन 10 किलो से भी कम है। इसका डिजाइन आम बाइकों से अलग है। इस पर बैठने से ऐसा आभास होता है जैसे किसी छोटे से स्टूल पर बैठे हो। बाइक को कंट्रोल करने के लिए सीट के दोनों ओर हैंडिल लगे हैं। इस हैंडिल में ही एक्सलेटर और ब्रेक हैं। रफ्तार के मामले में भी यह बाइक अच्छी है, यह अधिकतम 20 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से दौड़ सकती है।

परिकल्पना नई है, तकनीक नई है, इस कारण कीमत करीब 3500 यूरो है। यह आने वाले समय में कम होती चले जाएगी।

संबंधित समाचार यहाँ मिल सकेगा। इसकी वेबसाईट यहाँ है। डिज़ाईन आदि की जानकारी यहाँ मिल सकेगी।

वैसे आप इसी ब्लॉग पर फोल्ड की जा सकने वाली कार के बारे में पढ़ चुके हैं और सन 2020 के वाहन का मज़ेदार वीडियो भी देख चुके हैं।

अब बताईए, क्या इरादा है आपका!?

Monday 7 September 2009

अगले 10 वर्षों में कृत्रिम मानव मस्तिष्क, असली का स्थान ले लेगा!?

तंत्रिका वैज्ञानिकों का दावा है कि अगले 10 वषों के भीतर वैज्ञानिकों को मानव मस्तिष्क का मॉडल विकसित करने में सफलता मिल सकती है। यह कृत्रिम दिमाग असली दिमाग की तरह काम करेगा। स्विट्जरलैंड के ब्रेन माइंड इंस्टीट्यूट (Brain Mind Institute) में प्रोफेसर हेनरी मार्करैम ने मीडिया से बातचीत में कहा, ‘मैं पूरी तरह यह मानता हूं कि ऐसा तकनीकी और जैविक रूप से सम्भव है। ऐसी ईजाद के लिए भारी संसाधन की जरूरत पड़ सकती है। वित्तीय संसाधन की कमी इसमें आड़े आ सकती है। यह बेहद खर्चीली परियोजना साबित होगी।

आगे उन्होंने कहा कि इंसान के दिमाग की प्रतिकृति तैयार करना वाकई बेहद जटिल काम है, क्योंकि दिमाग करोड़ों तंतुओं, लाखों नसों, लाखों प्रोटीन, हजारों जीन आदि से बना होता है। इतनी सूक्ष्मताओं का सार समझते हुए दिमाग की रचना करना बेहद जटिल तो है, पर असम्भव नहीं। कभी हम रोबोट की परिकल्पना को काल्पनिक मानते थे, पर आज रोबोट इंसान से हजारों गुना ज्यादा सक्रियता के साथ बारीक से बारीक कार्यों को अंजाम देते हैं।


(मानव मस्तिष्क की जटिलता दर्शाता एक वीडियो)

ब्लू ब्रेन परियोजना से जुड़े प्रोफेसर हेनरी मार्करैम का मानना है कि कृत्रिम दिमाग के विकास में दुनिया भर में पिछले सौ वषों में हुए अनगिनत शोध के निष्कषों को एक जगह इकट्ठा कर दिमागी सक्रियताओं को समझना बहुत बड़ी चुनौती है। उनके मुताबिक दिमाग के आंतरिक वैद्युत-चुम्बकीय-रासायनिक प्रारूपों के रहस्य को जानना इस दिशा में बड़ी कामयाबी होगी।

मानव मस्तिष्क के माइक्रोसर्किट सहित पूरा समाचार यहाँ पढ़ें

Tuesday 1 September 2009

रोबोट चलाएगा अब कार को, इसी वर्ष हीथ्रो हवाई अड्डे पर चलने लगेंगी

आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आप गाडी चला रहे हैं और आपके पीछे कोई शानदार सी कार बिना ड्राइवर के दौड़ी चली आ रही हो। आज यह सोच कर कोई भी सिहर जाएगा, लेकिन 10 वर्ष बाद यह नजारा आम हो जाएगा। कम से कम रोबोटिक्स पर शोध कर रहे विशेषज्ञों का तो यही मानना है।


ब्रिटेन की रॉयल एकेडमी ऑफ इन्जीनियरिंग की ओर से 'ऑटोनॉमस सिस्टम्स' शीर्षक से जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि बिना ड्राइवर के स्वचालित वाहन, लेजर राडार, वीडियो कैमरा और सैटेलाइट की मदद से सडक पर चल रहे वाहनों और पैदल लोगों के बारे में जानकारी हासिल किया करेंगे। रिपोर्ट के सह-लेखक और साउथैम्पटन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विल स्टीवर्ट के मुताबिक उच्च तकनीक का इस्तेमाल करने वाले ड्राइवर रहित ट्रक व कारों की वजह से सडक दुर्घटनाओं में भी काफी कमी आएगी।


पिछले सप्ताह पेश किए गए ड्राइवर रहित पर्सनल रैपिड ट्रान्सपोर्ट व्हीकल (PRTV) कुछ समय बाद हीथ्रो की सडकों पर दौडना शुरू कर देंगे। ये एक प्रकार की ड्राइवर रहित कारें होंगी, जो 25 मील प्रति घण्टा की रफ्तार से विशेष रूप से इनके लिए बनाई गई सडकों पर चलेंगी। ये ड्राइवर रहित वाहन, लेजर राडार और कैमरों के इस्तेमाल से ट्रैफिक की जानकारी प्राप्त करेंगे। ये जेब्रा क्रॉसिंग, सडके के गड्ढों आदि को देखकर निर्णय लेने में माहिर होंगे।

(इसी वर्षांत में हीथ्रो हवाई अड्डे पर चलने वाली इन रोबोट चलित कारों की एक परिकल्पना का वीडियो)

इन रोबोट चलित वाहनों के नफे नुकसान यहाँ पढ़े जा सकते हैं, कुछ आलोचना यहाँ मिलेगी। कुछ भारी भरकम आकार के (3 MB से अधिक) सम्बंधित चित्र यहाँ मिलेंगे। बेहद दिलचस्प तकनीकी जानकारियाँ भी उपलब्ध हैं। अगर आप इन्हें डिज़ाइन करने की क्षमता रखते हैं तो हुनर दिखाने में देर ना करें अपना डिज़ाइन,  प्रतियोगिता में भेजने के लिए पंजीकरण करवाएँ।  अधिक जानकारी के लिए यहाँ देखिए।

अब क्या कहें कल की दुनिया के बारे में! करीब डेढ़ साल पहले यहीं लिखा गया था कि ड्राईवर को कार बताएगी कि आगे खतरा है लेकिन अब तो कार खुद ही चलेगी!

Monday 10 August 2009

मानव सभ्यता के खात्मे के लिए रोबोट्स का विद्रोह? वैज्ञानिकों ने गुप्त बैठक की!

कृत्रिम बौद्धिक स्तर वाले उपकरणों के विकास में प्रगति जहां विज्ञान क्षेत्र की कल्पना को खतरनाक तरीके से वास्तविकता के करीब ला रही है, वहीं चिंतित वैज्ञानिकों ने एक ऐसे खतरनाक परिदृश्य की कल्पना की है जिसमें घातक रोबोट विद्रोह कर देंगे। यह एक ऐसी स्थिति है जिसे अब तक विज्ञान पर आधारित काल्पनिक फिल्मों में ही देखा गया है।


प्रमुख शोधकर्ताओं ने आगाह किया है कि हो सकता है कि हम अत्याधुनिक मशीनें बना रहे हैं, लेकिन इसका नतीजा शायद ऐसी मशीनों के रूप में हो सकता है जो मानव जाति के लिए खतरा पैदा कर दें। ‘दि टाइम्स’ ने खबर दी कि अपने शोध को सीमित कर देने के बारे में चर्चा करने के लिए हुई एक गोपनीय बैठक में शीर्ष वैज्ञानिकों ने आगाह किया कि समाज के बढ़ते कार्यदबाव को साझा करने वाली कम्प्यूटर आधारित प्रणालियां, यानी युद्ध छेड़ने से लेकर फोन के इस्तेमाल तक की प्रौद्योगिकी, पहले से ही विध्वंसक स्तर पर पहुंच चुकी हैं।

एसोसिएशन फॉर दि एडवांसमेंट ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस’ की ओर से कैलिफोर्निया के मोंटेरी बे में एक कॉन्फ्रेंस स्थापित करने वाले माइक्रोसॉफ्ट के एक अहम शोधकर्ता इरिक होरवित्ज ने आगाह कहा, ‘‘ये शक्तिशाली प्रौद्योगिकियां हैं जिनका इस्तेमाल अच्छे तरीके से या फिर डरावने तरीके से हो सकता है।’’



(संभावित युद्द की कल्पना, टर्मिनेटर फिल्म में)

अधिक जानकारियाँ गूगल बाबा के सौजन्य से यहाँ देखी जा सकती हैं।

और हाँ, क्या आप जानते हैं कि ट्विटर आदि पर किए गए हाल ही के भयंकर सायबर हमले में रोबोट्स का समूह शामिल था?

इतज़ार कीजिए अगली पोस्ट का!

Sunday 26 July 2009

इंसान के अहसासों को समझ कर समाज का हिस्सा बनेंगे रोबोट

आईए विज्ञान का एक और अजूबा देखा जाये। आने वाले समय में हमारे सुख में हंसने, दुख में दिलासा देने वाले रोबॉट अब हकीकत बनने वाले हैं। यूरोपियन शोधकर्ता ऐसे रोबॉट विकसित कर रहे हैं जो हमारे अहसासों के साथ ताल-मेल बैठा सकें। इसके लिए खास तौर पर इनके तंत्रिका तंत्र पर काम किया जाएगा।

(फीलिक्स का एक कॉपीराईटेड चित्र, साभार: FEELIX Gallery)

इस अनोखे प्रॉजेक्ट का नाम 'फीलिक्स ग्रोइंग' है। इसके तहत ऐसे रोबॉटों पर काम हो रहा है जो अपने आस-पास के इंसानों को देख कर, उनके शारीरिक लक्षणों से उनकी भावनाओं का अंदाजा लगा सकें। यह सीखने का काम आर्टिफिशल न्यूरल नेटवर्क की सहायता से होगा। यह नेटवर्क इन समझदार रोबॉट की समझदारी बढ़ाने में सहायता करेगा।

इसके लिए कैमरों और सेंसर का इस्तेमाल किया जाएगा। इनकी सहायता से किसी भी इंसान के चेहरे के भावों, उनकी आवाज और नजदीकी का अंदाजा लगाया जाएगा। इस तकनीक में रोबॉटिक्स के साथ सामंजस्य स्थापित करने की काबिलियत, मनोविज्ञान, तंत्रिका विज्ञान और व्यवहार विज्ञान को शामिल किया गया है।

असल में यह रोबॉट महज मशीनी खिलौने नहीं होंगे। ये हमारे भविष्य के समाज का हिस्सा होंगे, जो मरीजों, बुजुर्ग लोगों, विकलांग की सहायता और तीमारदारी करेंगे। इसके अलावा यह भी हो सकता है कि वे हमारा मनोरंजन भी करें।

इस तकनीक से बना रोबॉट एक मानव शिशु की तरह अपने अनुभवों से सीखेगा कि उसके आसपास इंसान किस तरह प्रतिक्रिया कर रहे हैं। अगर कोई रोबॉट को देख कर डर जाए या चीखने लगे तो यह रोबॉट अपना व्यवहार और दोस्ताना बना लेगा। अगर जरूरत पड़ी तो वह पीछे भी हट जाएगा। दूसरी तरफ, अगर कोई खुशी से चीख पड़ा तो यह रोबॉट इतना काबिल होगा कि इस अंतर को समझ कर उसी के मुताबिक प्रतिक्रिया करे।

इस परियोजना की समन्वयक डॉ. लोला कैनामेरो का कहना है कि यह दरअसल 'बिहेवरल और कॉन्टेक्ट फीडबैक' है। यानी, व्यवहार और स्पर्श से मिली जानकारी के मुताबिक काम करना। इसमें मायने रखेगा कि आप भी रोबॉट के लिए सहयोगी भावनाएं रखें, अच्छे शब्द बोलें, उसकी सहायता करें। फिलहाल इस रोबॉट का ऐसा चेहरा विकसित करने पर शोध चल रहा है है जो अहसासों को दिखा सके। इससे लोग उन्हें आसानी से अपना सकेंगे।


(संभावित तकनीक को दर्शाता एक वीडियो)

इस संबंध में कुछ कॉपीराईट वाले चित्र यहाँ देखे जा सकते हैं। समाचार व अन्य जानकारियाँ यहाँ तथा यहाँ देखी जा सकती हैं।

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